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Medicine of Japanese Encephalitis

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जापानी एनसेफलाईटिस का इलाज

दोस्तों सबसे पहले मैं आपको बता दूँ कि मैं कोई डिग्रीधारी डाक्टर नहीं हूँ।
हा स्वयं के उपयोग के लिये या अपने बच्चों के इलाज के लिये मैं होमियोपैथिक दवाओं का प्रयोग करता हूँ। मैंने उन्हें आज तक सही सलामत रखा है। स्वयं दवा का प्रयोग करना गलत है। लेकिन पैसे के अभाव और प्रचलित दवाओं के दुस्प्रभाव को ध्यान में रखते हुए मैंने खुद कई होमियोपैथिक पुस्तकों का अध्ययन किया है।
आज इस लेख को लिखने का कारण मुजफ्फरपुर के उन बच्चों की मौत की खबरें हैं। जिसने मुझे ये मेरा ब्रह्मास्त्र सार्वजनिक करने पर मजबूर किया है।
जी हा ये मेरा ब्रह्मास्त्र है। ये कभी विफल नहीं हुआ है।
लेकिन आप इसे बिना किसी डाक्टर के देखरेख के न प्रयोग करें।
आप दवा जानने से पहले ये जानलें कि ये मुझे कैसे मिली तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
मै एक बार मुम्बई गया था। वहाँ बारिस में भीगने के वजह से मुझे बुखार हो गया। और वो ठीक नही हो रहा था। तब मैं कोई होमियोपैथ नहीं था। तमाम अंग्रेजी दवाये खाने के कारण मैं और दुबला हो गया। मेरे सिर के बाल तक झड़ गये। मैं दो बार गंजा हो चुका हूँ। तब मैं होमियोपैथी की ओर झुका। मैंने बहुत सी विदेशी लेखकों, जैसे केन्ट, हैनीमैन और विलियम बोरिक की पुस्तकों का भी अध्ययन किया। हैनीमैन सर की मटेरिया मेडिका प्युरा लेने मैं मुजफ्फरपुर ही गया था। उस समय मेरा बेटा जो लगभग दो साल का था। वो अपने नाना के घर गया था। उसे वहाँ बुखार लगा। मैं किताबे लेकर घर चला आया। और उनको पढ़ने लगा।
लगभग चार दिन बाद फोन आया कि आपके बेटे की तबियत खराब है। लोग ग्लुकोज की बोतल चढ़ाने की बात कर रहे हैं। मैने कहा नहीं बोतल नहीं चढ़ेगा मैं आ रहा हूँ। बरिस में भीगते हुए मैं वहाँ पहुच गया। वहाँ देखा कि यही कुछ डेक्सामेथासोन ओर अन्य जेनेरिक दवायें दी गयी थी। मैंने लोगों से झगड़ा करके, क्योंकि वो लोग ओझा सोखा के चक्कर में पड़ गये, अपनी बीबी से कहा कि बच्चे को जिन्दा देखना चाहती होतो मेरे साथ चलो। वो मन मार कर चल दी। रास्ते में वो बोली कि चलिये पहले अंग्रेजी दवा में दिखा लेते हैं। मैंने भी मन में कहा कि ठीक है नही तो तुम ही बाद में कहोगी कि आपने मेरी बात नहीं मानी। हमलोग अपने यहाँ पडरौना के एक सुप्रसिद्ध डाक्टर को दिखाये। उन्होंने खून जाच कराने को कहा। जाच मे चार तरह का टायफाईड निकला।
डाक्टर साहब ने बाईस इनजेक्सन और अन्य दवायें दी।कुल मिलाकर बाईस लगा था। जब आखिरी दवा खत्म हुई तो जो लड़का दौड़ कर चलता था वो ऐसी हालत में आ गया कि वो अपने हाथों से अपने शरीर को नही रोक सकता था। रह रह कर आखें उल्टी तरफ घुमाता था। खाना पीना बन्द। केवल अचानक में बोल पड़ता था ” पापा”। सारी संवेदनायें समाप्त सी होने गली थी।
तब मैंने सोचा कि अब तो ये मुझे गोरखपुर भी दिखायेगा। और वहाँ भी न ठीक हुआ तो मैं अपने बेटे से हाथ धो बैठुंगा।
इस बीच मैं मटेरिया मेडिका प्युरा पढ़ रहा था।
उसमे स्ट्रामोनियम अध्याय में इसके सारे लक्षणों का वर्णन था।
मैंने लक्षणों के आधार पर सिफिलिनम 1M + Lach.200 केवल एक खुराक दिया।
और Stramonioum 30 और Kaliphos 30 दो दो घन्टे पर देने लगा। अगले दिन उसे 99f बुखार लगा। उसके अगले दिन बुखार सामान्य हो गया। उसने थोड़ा सा कुछ खाया भी। कुछ दिन बाद वो मेरी उंगली पकड़कर चलने लगा और पन्द्रहवे दिन वो फिर वैसे ही दौड़ने लगा जैसे पहले दौड़ता था।
बाद में मैने इस फार्मूले को और कारगर बनाने के लिये कुछ दवाओं को और जोड़ा ताकि भविष्य में कभी ये विफल नहो।
फाइनल दवा है।
Syphi.1M + Pyrog.200 हफ्ते में एक बार सिफिलिनम लक्षणों के आधार पर बदला भी जा सकता है। लेकिन अक्सर काम कर जाता है। बाकी जो दवाये हैं उन्हें आवश्यकतानुसार दो दो घन्टे या उससे कम या अधिक अन्तराल पर भी दिया जा सकता है।
वो दवायें हैं
Ars.30, Stram. 30, NV.30, Rt.30, Hell.30, KaliPhos.30,
दवाओं का पूरा नाम आपको केन्ट रिपर्टरी में मिल जायेगा या किसी होमियोपैथ को ये दिखायेंगे तो वो समझ जायेगें।
एक बार फिर खुद दवायें न प्रयोग करें किसी डाक्टर के देखरेख में ही दवायें लें।
ये फार्मूला कई तरह के बुखारों को ठीक किया है। यदि आपको लाभ हो और हमें आप किसी तरह का लाभ देना चाहें तो इस साईट से कोई सामान खरीद लीजियेगा। धन्यवाद।

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